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समीक्षा के बहाने

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आजादी मेरा ब्रांड - अनुराधा बेनीवाल दिल्ली पुस्तक मेला से जब किताब ' आजादी मेरा ब्रांड ' घर लाकर देखी तो लगा अनावश्यक रुपए खर्च कर दिए हैं। हालांकि इसका आकर्षक कवर देखकर ही मैंने ये खरीदी थी। काफी समय तक यूं ही पड़ी रही शोपीस की तरह। फिर पढ़ने को कुछ नया नहीं था, तो इसके पन्ने पलटने की जुर्रत कर ही ली। उसके बाद मैं इस किताब में ऐसा डूबा की दो दिन में पूरी पढ़ ली। अब ये मेरी पसंदीदा किताबों में से एक है। अब तक कई लोगों को पढ़ने के लिए दे चुका हूं और कईयों को रिकमेंड कर चुका हूं। दुनियां जहान को नए तरीके से देखने के लिए, ये एक बेहद जरूरी किताब है। लेखिका अनुराधा बेनीवाल असल मायनों में अपने इस यात्रा संस्मरण के जरिए आजादी के पैमानों से आजाद होने की सीख देती हैं। जीवन को सही मायने में समझने और नए तरीके से पिरोने की प्रेरणा देती हैं।  स्वानंद किरकिरे की टिप्पणी के साथ यह किताब शुरू होती है, जिन्होंने लेखिका अनुराधा बेनीवाल को नए जमाने की भारतीय फकीरन कहकर संबोधित किया है। राजकमल प्रकाशन के ही उपक्रम से प्रकाशित यह लेखिका की यूरोप घुमक्कड़ी का चिठ्ठा है, जिसे अनुराधा बे...