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उम्र के इस पड़ाव पर

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काबिलियत

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कुछ तो करूं अपनी काबिलियत के अनुरूप ये बात रूह को रफ्तार दे जाती है, लेकिन हूं किस काबिल आखिर ये बात समझने में कई रात बेकार हो जाती हैं। ना पंहुच पाता किसी अंजाम की ओर यूं ही मेरी अकल बढ़ती जाती है, थोडा जोश पाकर कुछ नया करता हूं कभी और फिर अपनी ही नजर लग जाती है। सफलता फिर नहीं दिखती आस-पास फटकती और अब तकदीर मेरी गुनहगार हो जाती है, वक्त और किस्मत के साथ चलती इस तकरार में हर बार मेरी ही हार हो जाती है। औकात से ऊपर वजूद हो मेरा ये चाहत मेरी नींद उड़ा ले जाती है, और कुछ हासिल करने की इस कसमकश में मेरी बेचैनी को खुराक मिल जाती है। कुछ तो करूं अपनी काबिलियत के अनुरूप ये बात रूह को रफ्तार दे जाती है....                                     उमेश नैलवाल

बुनियाद

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उलझे  से इस रिश्ते की बुनियाद गिरने  का  डर   है मुझे , वरना  अ पने भरोसे मे लेकर तुझे सारा हाल बताने का मन करता है। फ़िक्र   है तेरे सपनों का अंगना ना बिखरे   मेरी खातिर , वरना अपनी नींदों   में  ते रे खयालों को जीने का मन करता है। तेरे मासूम से चेहरे   पर   उदासी   का   डर लगता है मुझे , वरना तेरी पलकों पर बैठकर   बह जाने   का मन करता है। तेरे दिल का   वहम   भी है   बेफिजूल   मेरी आदत से, वरना तेरी धडकनों की रफ्तार बन जाने का मन करता है। तेरी कदर की फितरत बेपरवाह हो रही है हर पल मुझसे , वरना दुःखों के अन्धेरे में तेरा साया बन जाने का मन करता है। मेरी   वसीयत मुझे मामूली नजर आती है तेरी बंदगी में , वरना तेरी जिन्दगी और किस्मत दोनों लिखने का मन करता है। हर एहसास   तेरे ख्यालों की बैचैनी में गुजरता है   मेरा , पर आखि री सांस तक तेरी बेकरारी म...

अबला

नहीं बेबस और लाचारी मैं समाज की हिस्सेदारी में हां झेलें जाने कितने फरोस यहां जिस्म से कईं टुकड़ों में कोई लोमड सा चिपटा मुझमें  छटपटा के भी मैं हार गई झेले जाने कितने कतल इन हादसों के ही इम्तहान में मैं ममता भी थी, बेटी भी हां दुलार भी थी किसी भाई की, ठगी गईं थी सब रूपों में  तन लडकी का लेकर मैं फौंज सिरफिरे ले आ जाते अरमानों का गला घोंटने, सम्भलती जब-जब आंसू छिपाकर अपने जख्म-ओ-मसले में हां तपी हूं कितनी लपटों में बस बची रही मैं जलने को छला कभी ससुराल ने मुझको कभी डसा बेगानों नें कभी डायन बता कर पीटा मुझको कभी कोख में ही दुत्कारी मैं नये बहाने लेकर जीती  मरती रही बेचारी मैं रख लेती थी चीख दबाकर सांसों में खूंखार सी रातों में बस बहुत हुआ अब नहीं सहूंगी अबला ना समझ हूं दुर्गा मैं...                                                                  उमेश नै...