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Showing posts from 2018

राजनीति आजकल

दौर हो चुनावी तो अपनी जुबां को आदाब कर दोगे। सत्तासीन हो जब ही अपनी तहज़ीब नीलाम कर दोगे।। बयार में फैली हर ख़ुशबू में नफ़रत घोल दोगे। कोई पूछूं जो सवालात तो मेरी कब्र खोल द...

इनायत

इनायत थी, तुम दाखिल हुए मेरी ज़िन्दगी में। गर्दिश, कि तुम हाथों की लकीर ना बन सके।। जितना बन पड़ा, कुर्बां किया तुम्हारी बंदगी में। मोहब्बत की दास्तां में, हम और अमीर ना बन स...

परिस्थिति

जब जब खिलाफ़ थी परिस्थितियां, उम्मीदों ने सहारा दिया है। ज़िन्दगी बिखरने को तैयार थी, ख्वाहिशों ने बसेरा दिया है। माथे पर शिकन की लकीरें बनी, वक्त ने मोहलत का दिलासा दिया है...

किरदार

एक कहानी मैनें लिखी, एक कहानी तुम कह रही हो। मैने तुम्हें लिखा, तुम कुछ और जी रही हो। तुम्हारे वजूद पर, आगे बढ़ी मेरी कहानी की पराकाष्ठा। मेरे किरदार को झुठलाकर, खुद की बेवफा...

वक्त तन्हा ना कर देना....

तुम्हारे जहन में कैंद हो मेरा जमाना, तो मेरी खामोशियों संग उसे आबाद कर देना। कोई अफसोस गर जताये तुम्हारे अल्फ़ाज़, तो मेरे हिस्से में अन्धकार कर देना। कभी काटने को दौड़े को...

पहाड़

पहाड़ विरान कर  जो मैदान बनाये तुमने, कुछ मजबूरी, कुछ मगरूरी में  नये जहां सजाये हमने। गांवों के पैमानों को  मैदानों ने सीमित किया, नगरों की सुविधाओं ने सींचा पहाड़ों से बैर कर लिया। गांव से अपनत्व खोकर भीड़ ने अकेलापन जन्मा, त्यौहारों ने खुदखुशी मनाई शहरों ने अपराध बख्शा। पहाड़ खोद अंधेर किया शहरों ने दिवाली मनाई, अपने बाशिंदे न्योतता रहा थान शहर की हवा सारी पीढ़ी लील गई। पहाड़ में जो हैं बचे झांकते हैं अपने आखिरी वक्त को, सब-कुछ ले गया शहर यहां चंद अपने सितम को डटे हैं।।                उमेश नैलवाल

परिस्थिति

ये जो ले आती है अनन्तता की ओर उपजाती है नये किस्से,  कुछ हादसे, कुछ नीरसता,  कुछ मोड़, नये रास्तों की ओर कुछ नये अंदेशे पैदा कर  वेदना की आहट होती है लेकिन रूह को आभास नहीं, फिर स...