पहाड़ विरान कर जो मैदान बनाये तुमने, कुछ मजबूरी, कुछ मगरूरी में नये जहां सजाये हमने। गांवों के पैमानों को मैदानों ने सीमित किया, नगरों की सुविधाओं ने सींचा पहाड़ों से बैर कर लिया। गांव से अपनत्व खोकर भीड़ ने अकेलापन जन्मा, त्यौहारों ने खुदखुशी मनाई शहरों ने अपराध बख्शा। पहाड़ खोद अंधेर किया शहरों ने दिवाली मनाई, अपने बाशिंदे न्योतता रहा थान शहर की हवा सारी पीढ़ी लील गई। पहाड़ में जो हैं बचे झांकते हैं अपने आखिरी वक्त को, सब-कुछ ले गया शहर यहां चंद अपने सितम को डटे हैं।। उमेश नैलवाल