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समीक्षा के बहाने : तमस

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सत्ता व राजनीति मानवता सहित संपूर्ण समाज व सभ्यता को प्रभावित करने वाले तत्व हैं। किस तरह सत्तासीन हुकूमत सत्ता पर काबिज रहने के लिए धर्म और संप्रदाय के नाम पर आग सुलगाती है और तमाम मानवीय पहलुओं को खाक करने के बाद संवेदना का मरहम लगाते हुए अमन-चैन के प्रणेता वाला चोला पहन लेती हैं। इसी संपूर्णता को बेहद संजीदगी के साथ ' तमस ' में ' भीष्म साहनी ' ने उपन्यास के माध्यम से पिरोया है। स्वतंत्रता से पूर्व भारत-पाकिस्तान बंटवारे की पृष्ठभूमि व सांप्रदायिक दंगों पर आधारित यह उपन्यास आज के दौर में भी उतना ही प्रासंगिक नजर आता है। अपनी आत्मकथा ' आज का अतीत ' में भीष्म साहनी, मुंबई के निकट भिवंडी नगर में हिंदू मुसलमान दंगों से द्रवित होकर इस उपन्यास को लिखने का जिक्र करते हैं। जिससे पता चलता है कि उपन्यास में घटित तमाम घटनाएं कहीं ना कहीं उनके निजी जीवन का हिस्सा रही हैं। उपन्यास में अंग्रेजी हुकूमत की नीतियों सहित कांग्रेसी नेताओं की आपसी खींचतान को भी प्रमुखता से उभारा गया है। 311 पृष्ठों में समाहित 5 दिन के इस संपूर्ण घटनाक्रम को दो खंडों में बांटा गय...