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Showing posts from 2020

समीक्षा के बहाने : तमस

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सत्ता व राजनीति मानवता सहित संपूर्ण समाज व सभ्यता को प्रभावित करने वाले तत्व हैं। किस तरह सत्तासीन हुकूमत सत्ता पर काबिज रहने के लिए धर्म और संप्रदाय के नाम पर आग सुलगाती है और तमाम मानवीय पहलुओं को खाक करने के बाद संवेदना का मरहम लगाते हुए अमन-चैन के प्रणेता वाला चोला पहन लेती हैं। इसी संपूर्णता को बेहद संजीदगी के साथ ' तमस ' में ' भीष्म साहनी ' ने उपन्यास के माध्यम से पिरोया है। स्वतंत्रता से पूर्व भारत-पाकिस्तान बंटवारे की पृष्ठभूमि व सांप्रदायिक दंगों पर आधारित यह उपन्यास आज के दौर में भी उतना ही प्रासंगिक नजर आता है। अपनी आत्मकथा ' आज का अतीत ' में भीष्म साहनी, मुंबई के निकट भिवंडी नगर में हिंदू मुसलमान दंगों से द्रवित होकर इस उपन्यास को लिखने का जिक्र करते हैं। जिससे पता चलता है कि उपन्यास में घटित तमाम घटनाएं कहीं ना कहीं उनके निजी जीवन का हिस्सा रही हैं। उपन्यास में अंग्रेजी हुकूमत की नीतियों सहित कांग्रेसी नेताओं की आपसी खींचतान को भी प्रमुखता से उभारा गया है। 311 पृष्ठों में समाहित 5 दिन के इस संपूर्ण घटनाक्रम को दो खंडों में बांटा गय...

समीक्षा के बहाने

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आजादी मेरा ब्रांड - अनुराधा बेनीवाल दिल्ली पुस्तक मेला से जब किताब ' आजादी मेरा ब्रांड ' घर लाकर देखी तो लगा अनावश्यक रुपए खर्च कर दिए हैं। हालांकि इसका आकर्षक कवर देखकर ही मैंने ये खरीदी थी। काफी समय तक यूं ही पड़ी रही शोपीस की तरह। फिर पढ़ने को कुछ नया नहीं था, तो इसके पन्ने पलटने की जुर्रत कर ही ली। उसके बाद मैं इस किताब में ऐसा डूबा की दो दिन में पूरी पढ़ ली। अब ये मेरी पसंदीदा किताबों में से एक है। अब तक कई लोगों को पढ़ने के लिए दे चुका हूं और कईयों को रिकमेंड कर चुका हूं। दुनियां जहान को नए तरीके से देखने के लिए, ये एक बेहद जरूरी किताब है। लेखिका अनुराधा बेनीवाल असल मायनों में अपने इस यात्रा संस्मरण के जरिए आजादी के पैमानों से आजाद होने की सीख देती हैं। जीवन को सही मायने में समझने और नए तरीके से पिरोने की प्रेरणा देती हैं।  स्वानंद किरकिरे की टिप्पणी के साथ यह किताब शुरू होती है, जिन्होंने लेखिका अनुराधा बेनीवाल को नए जमाने की भारतीय फकीरन कहकर संबोधित किया है। राजकमल प्रकाशन के ही उपक्रम से प्रकाशित यह लेखिका की यूरोप घुमक्कड़ी का चिठ्ठा है, जिसे अनुराधा बे...

प्रतिज्ञा : मुंशी प्रेमचंद

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मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य के उन कथाकारों में से हैं, जिनकी रचनायें मानवीय अभिव्यक्ति व संवेदनाओं से लबालब होती हैं। उनकी कथायें इतनी जीवन्त हैं कि वो आपसे सवाल करने लगती हैं, अपने भीतर झांकने को मजबूर कर देती हैं। बड़ी सहजता से प्रेमचन्द हमारे समाज और परिवेश को सामने रख देते हैं। उनकी कथाओं में उपेक्षितों की वेदना, प्रत्येक मन के भीतर उपजती सकारात्मक या नकारात्मक विचारोत्तेजना प्रकट होती है। प्रेमचन्द के विशाल रचना संसार में से एक उपन्यास है ‘प्रतिज्ञा’, जो एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसने अपनी भावनाओं और इच्छाओं को जनकल्याण के लिये समर्पित कर दिया। इस उपन्यास में त्याग और समर्पण का भाव है तो सामाजिक भेड़चाल और मानुषिक दोगलेपन की भी परतें उकेरी गई हैं। उपन्यास में अमृतराय, दीनानाथ, प्रेमा, पूर्णा और कमलाप्रसाद जैसे मुख्य किरदार हैं तथा लाला बदरीप्रसाद, सुमित्रा, पंडित बसन्त कुमार, देवकी और कहार जैसे सहायक किरदारों से भी भेंट होती है। कहानी दो पात्रों अमृतराय और दाननाथ के संवाद के शुरू होती है, दोनों परममित्र हैं लेकिन कई स्तरों पर दोनों एक-दूसरे के परस्पर विरोधी भी हैं।...

कहानी : कानाफूसी

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आज श्यामपुर की सड़कों में चर्चाओं का बाजार गर्म था। चर्चा का कारण थी एक लड़की और चर्चा के केन्द्र में थी लड़की की मां। बर्तन वाला चन्दू बोला- मां के लक्षण ई ठीक नी थे। बेटी तो कुकर्म करेगी ही। होटल वाला अम्बे बोला- रघु भी इसकी मां के कुकर्मों की वजअ से इ नवान खाकर मरा। सब्जी वाला गोपू अपनी सुनाने लगा- जब से ये देहरादून गये आजाद हो गये थे, लगाम लगाने वाला कोई था नहीं, जब से रघु मरा इस रण्ड़ी के येसे ही कारनामें सुनाई देते हैं। एक और दुकानदार बोला- मां ठीक हुनी ता नोना भी ठीक हवन। मां ही आवारा होगी तो लड़की तो दो कदम आगे ही निकलेगी...... ब्ला, ब्ला, ब्ला,...................    रघु, अपनी पत्नी दीपा और 2 बच्चों पूजा और अभय के साथ श्यामपुर कस्बे में किराये के कमरे में रहता है। वह छोटे-मोटे काम कर गुजारा करता है और दोनों बच्चे अपनी सम्पूर्ण दिनचर्या में स्कूल को प्राथमिकता देते हैं। रघु गम के अंदेशे में है, थोड़ा बहुत शराब भी पी लेता है। कभी पत्नी दीपा से मार पीट भी। लेकिन दीपा ग्रामीण महिलाओं की तरह बच्चों के लिए उस मारपीट को अपना हक समझकर सह लेती है। दीपा, जो एक ...

हम भारत के लोग...

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हमने जनता को भीड़ बनाया हमने जनतंत्र की हत्या कर दी हमने खुद पर सवाल दागे फिर हमने अपनी जुबां काट दी। कलम ने लिखनी चाही क्रांति, तो अपने ही खून से हमने अपने हकूकों के खिलाफ अपनी मौत लिख दी। हमने गुट बनाए सत्तासीनों के इशारों पर हमने नफरत का जहर पाया जाति धर्म की अकड़ पर जहां जैसी जरूरत पड़ी उनको भरपूर मौजूं बने हम। हम विश्व गुरु के प्रतियोगी थे उस पैमाने से सब चंगा था इतिहास की सारी लड़ाई में विनाश का परिणाम यही दंगा था। हमको भेड़ बनाकर हांका हम काटने दौड़ पड़े खुद को हम पहुंचे अपनी बर्बादी तक लोकतंत्र में अपना हक नहीं मांगा। हमने नहीं चाही रोटी न जाना शिक्षा, रोजगार का हाल, विकास के झोल में उलझे ना ही पूछे कभी बुनियादी सवाल। हमने किताबें छीनी बच्चों से पत्थर थमा दिए मासूम हाथों में हमारे नीति निर्धारकों ने हमें भारत का लोक बनाने की ठानी और सत्तासीनों ने हर दौर में उकसाकर, हमें जात धर्म पूछती हत्यारी भीड़ बना डाला। हम जलाकर अपनी झोपड़ी जहर के नशे में सब ख़ाक करते रहे हम सुलगाते दंगा और राख होने के बाद अमन करते रहे। हम भारत के लोग भारत को...

कहानी : नियति

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   ......…..................जब बेटियों से ही वंश की नींव है तो बेटियां अभिशाप कैसे है?......... लड़का आपके बुढापे का सहारा बनेगा और लड़की पराये घर की बहु ! आप ये मान्यता बदल कर देखिये और यकिन मानिये, जो ममत्व वृद्धावस्था में आपकी बेटी में आपके प्रति होगा, उसकी रत्ति भर संवेदना भी आपको बेटे में नजर नहीं आयेगी। जो संभावनाएं आपको बेटे में नजर आती हैं, उन्हें एक बार बेटी में तलाश के देखिए.....    मानवीय सभ्यता के उत्थान से ही मातृ सत्ता मानवीय समाज के विकास में प्रारंभिक भूमिका निभाती आयी है, क्योंकि स्त्री ही सृष्टि का आरंभ और पतन है। सभ्यताओं में स्त्री ही नेतृत्व कर्ता रही है लेकिन उस शक्ति को कुशलता के साथ क्षीण कर पितृसत्तात्मक समाज में तब्दील कर दिया गया। इसके लिए बहुत से मिथक और सिद्धांत रचे गए। अब उस नारी को किसी की पत्नी और बेटी के रूप में ही जाने जाने की अपेक्षा की जाती है। उसे स्वतंत्र अस्तित्व और मुखिया स्वीकारने की हिम्मत हमारे समाज में नहीं बची है........... धन्यवाद।     इन शब्दों के साथ 'कन्या भ्रूण हत्या' विषय पर हो रहे कार्यक्र...

समीक्षा के बहाने...

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लॉकडाउन के इन दिनों समय काटने के लिए चयनित फिल्में देख रहा हूं। हालांकि यह समीक्षा न होकर बस प्रतिक्रिया भर है। बात ये है कि कल बेवफाई पर आधारित बॉलीवुड फिल्म 'ये साली आशिक़ी' देखी और आज प्रेमाधारित एक खूबसूरत मलयालम फिल्म '96' देख ली। दोनों बिल्कुल विपरीत, लेकिन दोनों अलग नजरिए से अच्छी फिल्म कही जा सकती हैं। कुछ कहानियां आपके जीवन से खुद ब खुद जुड़ने लगती हैं या कहें बहुत सी कहानियां लगभग एक सी होती हैं। आप उन कहानियों को देखते सुनते हुए अपना वो वक्त जीने, दोहराने लगते हैं।  'ये साली आशिक़ी' जहां प्रेम में मुझे अब तक घायल न होने पर शाबासी सी देती है, वहीं  फिल्म '96' देख कर खुद पर तरस आता है कि मैं आज तक ऐसा प्रेम क्यों नहीं जी पाया! जब किशोरवस्था में था, तो प्रेम कहानियों को जीने और सुनने के लिए बहुत उतावला रहता था। जेहन ओ दिमाग में बिल्कुल ऐसी ही कई कहानी, कई किरदारों के साथ जीता आया। लेकिन असल में कभी ऐसा संपूर्ण प्रेम जीने या शुरू करने का मौका नहीं मिला। एक दोस्त से प्यार हुआ लेकिन एकतरफा ही रहा। दोस्ती टूट न जाए इसलिए कभी सामने कहने की हिम्मत नहीं...