समीक्षा के बहाने : तमस
सत्ता व राजनीति मानवता सहित संपूर्ण समाज व सभ्यता को प्रभावित करने वाले तत्व हैं। किस तरह सत्तासीन हुकूमत सत्ता पर काबिज रहने के लिए धर्म और संप्रदाय के नाम पर आग सुलगाती है और तमाम मानवीय पहलुओं को खाक करने के बाद संवेदना का मरहम लगाते हुए अमन-चैन के प्रणेता वाला चोला पहन लेती हैं। इसी संपूर्णता को बेहद संजीदगी के साथ ' तमस ' में ' भीष्म साहनी ' ने उपन्यास के माध्यम से पिरोया है।
स्वतंत्रता से पूर्व भारत-पाकिस्तान बंटवारे की पृष्ठभूमि व सांप्रदायिक दंगों पर आधारित यह उपन्यास आज के दौर में भी उतना ही प्रासंगिक नजर आता है।
अपनी आत्मकथा ' आज का अतीत ' में भीष्म साहनी, मुंबई के निकट भिवंडी नगर में हिंदू मुसलमान दंगों से द्रवित होकर इस उपन्यास को लिखने का जिक्र करते हैं। जिससे पता चलता है कि उपन्यास में घटित तमाम घटनाएं कहीं ना कहीं उनके निजी जीवन का हिस्सा रही हैं।
उपन्यास में अंग्रेजी हुकूमत की नीतियों सहित कांग्रेसी नेताओं की आपसी खींचतान को भी प्रमुखता से उभारा गया है। 311 पृष्ठों में समाहित 5 दिन के इस संपूर्ण घटनाक्रम को दो खंडों में बांटा गया है। प्रथम खंड में 13 अध्याय हैं, जो उपन्यास की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं तथा द्वितीय खंड में दंगों और उससे प्रभावित स्थितियों का वर्णन है। 21 अध्यायों के इस उपन्यास में पंजाबी, उर्दू तथा अंग्रेजी भाषाओं में संवाद किया गया है।
कहानी की शुरुआत नत्थू नाम के किरदार के साथ होती है, जो आधी रात, एक कोठरी में, एक सूअर के साथ बंद है। नत्थू जानवरों की खाल निकालने का काम करता है। 5 रूपए और व्यवसाई दोस्ती की एवज में मुराद अली द्वारा एक सूअर मारने का काम उसे दिया गया है। लेकिन नत्थू नहीं जानता उस सूअर का क्या किया जाएगा। वह बहुत मुश्किल के बावजूद अपना काम कर देता है। अगले दिन यही सूअर मस्जिद की सीढ़ियों पर मरा पाया जाता है। यहीं से होती है फीसद की शुरुआत। धार्मिक भावनाएं आहत हो जाती हैं और सूअर का बदला गाय से होकर, घर, परिवार, गांव, शहर बर्बाद होने तक नहीं थमता।
1947 के अप्रैल माह में पंजाब के किसी क्षेत्र को इसके केंद्र में रखा गया है। जहां हिंदू मुस्लिम सिख समुदाय साथ रहते हैं।
नत्थू को बाद में पता चलता है कि ये वही सूअर है, जिसे उसने मारा था। वह आत्मग्लानि से भर जाता है। यही दंगा फसाद अंत में उसकी मौत का कारण भी बनता है। जिसे उपन्यास के अंत में लेखक द्वारा स्पष्ट किया गया है।
उपन्यास में ऐसी कई कहानियों को पाठकों के सामने रखा गया है, जिन्हें असल में हम महज दुर्घटना करार देकर क्षणिक संवेदना के पश्चात भूल जाते हैं।
डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड के माध्यम से सामाजिक व पेशेवर जिंदगी के साथ निजी जीवन के सामंजस्य की अनिवार्यता को भी बताया गया है। किस प्रकार सभी धर्मों के ठेकेदार अपने अपने समुदाय के अनुयायियों को दंगे के लिए उकसा कर धर्म की रक्षा की बात करते हैं, ये दृश्य भी वास्तविक और आंखों देखा हाल सा लगता है।
वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो फसाद रुकवाने के लिए अपनी जान तक से खेल जाते हैं। जैसे जनरैल भाईचारे का संदेश देते हुए अपनी जान गवा देता है। वहीं कामरेड देवदत्त भी लगातार अपनी जान से खेलकर दंगों के बीच अमन व भाईचारे की अपील करता फिरता है।
अंग्रेजी सरकार के अफसरों का ये संवाद कि " वे किसी धार्मिक झगड़े के बीच नहीं आते ", सरकारी उदासीनता व फसादियों को समर्थन प्रकट करता है।
बक्शी जी की चिंता पर हावी यह संवाद कि ' स्थिति काबू में नहीं की गई तो शहर में चीलें मंडराएंगी ' बेहद गहराई लिए है और अंत में वाकई चीलें मंडराने लगती हैं, जब सिक्खों की महिलाएं एक के बाद एक कुएं में कूदकर जान दे देती हैं। वही नफरत भरे माहौल के बीच इंसानियत की उम्मीद और औरत के ममत्व को भी उसी कड़ी में जोड़कर उभारा गया है।
फसाद खत्म होने के बाद पीड़ितों द्वारा अपनी व्यथा सुनाने, जिसमें हर किसी को अपना दर्द ज्यादा गहरा लगता है, खूबसूरत अंदाज में लेखक ने सामने रखा है।
हरनाम सिंह के लड़के इकबाल सिंह को रमजान और उसके साथियों द्वारा जान बख्शने के बदले जबरन धर्म परिवर्तन कर इकबाल सिंह से शेख इकबाल अहमद बनाए जाने का वाकया भी बेहद खौफनाक है। आज के दौर में इस प्रकार की घटनायें अक्सर घटित हो रही हैं, जिसे मोब लिंचिंग नाम दिया गया है। जिसमें उग्र भीड़ किसी को भी मौत के घाट उतार देती है। कट्टरपंथी कैसे इंसानियत के दुश्मन और बर्बर होते हैं, यह भी उपन्यास में उभरता है।
मुराद अली, जो घटना का मुख्य सूत्रधार है, सोची समझी साजिश के तहत सूअर मरवा कर दंगा सुलगाता है और कहानी से गायब हो जाता है। अंत में सारी तबाही के पश्चात जब प्रशासनिक दखल से अमन की बस शांति अभियान पर निकलती है, तो मुराद अली ही नेतृत्वकर्ता बन, " हिंदू मुस्लिम एक हो, अमन कमेटी जिंदाबाद " के नारों के साथ प्रकट हो जाता है। यह घटना इंसानी फितरत के दोगले चेहरों का भी पर्दाफाश करती है। नेतृत्वकर्ता ही दंगा करवाते हैं और ख़ाक के बाद अमन-चैन के प्रणेता भी आसानी से बन जाते हैं।
भारत में सांप्रदायिकता आज भी उतनी ही मजबूती के साथ अपने पैर जमाए हैं, जितना कि भीष्म साहनी के उपन्यास तमस में वर्णित है। अभी भी हमारे नीति नियंताओं द्वारा जरूरत के हिसाब से सांप्रदायिकता को खाद पानी दिया जाता रहा है। आजादी से पूर्व विदेशी नियंताओं ने अपना राज बनाए रखने के लिए इसे पोषित किया। आज देश के ही राजनीतिक दल अपने हितों के लिए इसे हथियार बनाकर लगातार पेश कर रहे हैं। इस सारी प्रक्रिया में जो तबाही होती है, उसका शिकार गरीब और निर्दोष लोग बनते हैं, जो हिंदू, मुसलमान और सिख ना होकर बस इंसान होते हैं।
ओमांश
Comments
Post a Comment