बचपन की दोस्ती

            
वो सारी यादें सिलसिलेवार बदलने लगी एक कहानी में,
जब बचपन याद करने बैठा एक दिन तेरी तस्वीर लेकर
याद है तेरे साथ बैंच शेयर कर लेक्चर के वक्त क्लास में गप्प मारना
फिर दोनों की मम्मीयों का अचानक एक दिन स्कूल में आकर
हमारी शैतानियों की शिकायत करके अलग बिठाने की गुजारिश करना
कुछ दिन बिछड कर मम्मीयों को कोसना और फिर इक्कठे बैठ जाना
स्कूल लाइफ तक बैस्ट फ्रेंड होने का नाटक करके दोस्त बने रहना
कभी झगडने और गाली गंदी होने पर महीनों तक बात न करना
कई दिनों तक फिर बाते करने और गले लगने को तड़फना
और फिर से दोस्त बनने का बहाना ढूंढकर एक-दूसरे पर गलती थोपना
दोस्ती खत्म सी होती लगती आज, बचपन बीतने के बाद से
नए दोस्त बनते कालेज की पढाई और नई मैच्यौरिटी का आना
पर जब यादें बचपन की ताजा होती हैं समय के साथ-साथ
तो बचपन की पहली दोस्ती आज फीकी और गयी गुजरी लगती है
क्यूं आज वो अभिमान सा नजर आता तेरा-मेरा बात करना
क्यूं आज इतने बडे हो गए हम कि सब याद हो कर वो दोस्ती याद न आना
चलो माना इन्सानियत खत्म सी हो गई इस जहां में
लेकिन दोस्ती के किस्से तो आज भी मशहूर होते हैं ना।।
                                                उमेश नैलवाल

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