कहानी : कानाफूसी


आज श्यामपुर की सड़कों में चर्चाओं का बाजार गर्म था। चर्चा का कारण थी एक लड़की और चर्चा के केन्द्र में थी लड़की की मां।

बर्तन वाला चन्दू बोला- मां के लक्षण ई ठीक नी थे। बेटी तो कुकर्म करेगी ही।
होटल वाला अम्बे बोला- रघु भी इसकी मां के कुकर्मों की वजअ से इ नवान खाकर मरा।
सब्जी वाला गोपू अपनी सुनाने लगा- जब से ये देहरादून गये आजाद हो गये थे, लगाम लगाने वाला कोई था नहीं, जब से रघु मरा इस रण्ड़ी के येसे ही कारनामें सुनाई देते हैं।
एक और दुकानदार बोला- मां ठीक हुनी ता नोना भी ठीक हवन। मां ही आवारा होगी तो लड़की तो दो कदम आगे ही निकलेगी......

ब्ला, ब्ला, ब्ला,...................

   रघु, अपनी पत्नी दीपा और 2 बच्चों पूजा और अभय के साथ श्यामपुर कस्बे में किराये के कमरे में रहता है। वह छोटे-मोटे काम कर गुजारा करता है और दोनों बच्चे अपनी सम्पूर्ण दिनचर्या में स्कूल को प्राथमिकता देते हैं। रघु गम के अंदेशे में है, थोड़ा बहुत शराब भी पी लेता है। कभी पत्नी दीपा से मार पीट भी। लेकिन दीपा ग्रामीण महिलाओं की तरह बच्चों के लिए उस मारपीट को अपना हक समझकर सह लेती है।
दीपा, जो एक व्यवहारकुशल महिला है और आस पड़ोस की महिलाओं संग अपने दुःख-सुख बांटकर दिन गुजार लेती है। रघु भी पेशेवर ड्राइवर है, लेकिन लगातार काम की तलाश में इधर-उधर भटकता रहता है। काम ढूंढना और बदलना उसकी आदत हो चुकी है क्योंकि एक ही काम पर उसका मन टिका नहीं रहता।

  रघु अपना जीवन बोझिल समझने लगा है खर्चे उस पर भारी पड़ने लगे हैं। 2-3 महिने से घर का किराया बाकी है और मकान मालिक किराया मांगते परेशान है। दीपा मकान मालिक को कई बार टाल चुकी है जब भी किराये की बात होती है वह खुद भी शर्म से परेशान हो उठती है। समाज के दायरे के मुताबिक खाने के लाले पड़ जाये लेकिन पत्नी काम नहीं कर सकती, घर का माहौल कुछ ऐसा ही है। कुछ साल ऐसे ही जिन्दगी की गाड़ी घिसती है।

   फिर, समय इन्सान को कहीं भी ले चल सकता है, तो समय की ये बयार रघु को जीवन की बरबस राहों पर बच्चों संग देहरादून ले चली। शहर बड़ा था, उम्मीदें भी बड़ी थी। परिवार पालने और पोषने की अपने स्तर की कोशिशें भी जारी थी। लेकिन शराब की लत जिम्मेदारियों को बौना करने की कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। उन्ही आदतों और अवसादों में रघु के कुछ साल कट गये और बच्चे बड़े होने लगे। अभय 10वीं में पढ़ रहा था और पूजा 9वीं में। अभय पढ़ने में औसत है और पूजा अव्वल रहती है। रघु देहरादून में किराये की टैक्सी चलाने लगा। कुछ समय में परिवार में स्थिरता आने लगी। पत्नी दीपा घर और बच्चों को संभालने लगी थी। लेकिन ये दौर लम्बा ना चला। कुछ सालों में शहर की ये राहें भी रघु और उसके परिवार के लिये पथरीली होने लगी थीं। रघु शराब का आदी हो रहा था और मार-पीट करना और हल्ला करना भी जैसे उसका पेशा। बच्चे बड़े हो रहे थे और इन सब बातों का उन पर प्रत्यक्ष असर पड़ता था। ये सब बातें उस परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बन गईं। रोज का कलेश पत्नी दीपा और बच्चों के लिए जी का जंजाल बन रहा था। रघु का धंधा भी चौपट होने लगा। गृहस्थी का भार रघु को अवसादों की ओर ले जा रहा था। संघर्षों के जीवन से वह ऊब चुका था। इस भार को हल्का करने का रघु को एक ही रास्ता मौत के रूप में नजर आया और रघु सल्फास गटक बैठा। वह पत्नी दीपा और बच्चों को उनके हालत पर छोड़कर परलोक सिधार गया। इस रंगीन दुनियां को छोड़कर रघु तो अपनी जिम्मेदारी से भाग लिया। लेकिन दीपा के सामने एक बेरंग और खोखली दुनियां छोड़कर। जिसके रंग दीपा के दायरों से अब तक बाहर ही रहे थे। अब एक बड़ी जिम्मेदारी दीपा के सर आ चुकी थी।

समय और परिस्थिति के इस चक्र में अभय 12वीं पास कर चुका था और पूजा 12वीं में पड़ रही थी। अभय आगे की पढ़ाई करने को उत्साहित था मगर घर की माली हालत उसे पैसा कमाने को मजबूर कर रही थी। दोनों बच्चे अपनी किशोरावस्था को पार कर रहे थे, जहां बच्चे घर के माहौल की सीढ़ियो को लांघकर अनजान राहों पर सफर की ओर बढ़ने लगते हैं। बाप का साया बच्चों के सर से उठने का मतलब दीपा द्वारा दो किरदारों को जीने का नाम था क्योंकि बाप की भूमिका भी अब उसी को अदा करनी थी। अभय को भी अपनी जिम्मेदारी समझ आने लगी। दीपा शहर के एक प्राइवेट स्कूल में झाडू-पोछा लगाकर जिन्दगी की नई शुरूआत करने निकल पड़ी। सभी अपनी बिखरी जिन्दगी को पटरी पर लाने की कोशिश करने लगे। दीपा काम और बच्चों के बीच सामंजस्य बनाने की कोशिश करती लेकिन हर वक्त उन फूलों पर न्योछावर रहना उसके लिए संभव न था।

  अभय कुछ अच्छा खोजने की कोशिशों में चल पड़ा। वह तमाम जिन्दगियों की भीड़ को चीर कर निकलने की हट के साथ आगे बढ़ा तो उसके हिस्से में शहर के कुछ आवारा लफंगे साथी आये। शायद ये याराना उसे सहज लगा हो। अभय छोटे-छोटे काम कर कुछ पैसे कमाने लगा था। फिर गर्म खून और पैसों के इसी लालच ने अभय को अपराधों की ओर धकेलने में कोई देर न की। कुछ समय बाद दोस्तों संग वह चोरी भी करने लगा। वक्त के साथ हौसले बुलन्द होने लगे और अब वह बड़े अपराधों के अंजाम का खिलाड़ी बनने लगा था। घर पर पुलिस का आना-जाना शुरू हुआ। माहौल में गरमी आने लगी। इसी क्रम में अभय एक बड़ी वारदात में पुलिस के हत्थे चढ़ गया। दरअसल अभय और उसके साथी रात में एक व्यापारी के घर में घुसकर उसकी पत्नी की हत्या कर फरार हो गए थे। इस बार गुनाह सिर्फ चोरी ना था बल्कि हत्या का भी खुलासा हुआ था। अभय और उसकी गैंग के कुछ सदस्यों को लम्बा अन्दर कर दिया गया। दीपा अभय से मिलने के लिए अब खुद भी जेल के चक्कर लगाने लगी। पहले पति और फिर बेटे का इतनी जिल्लत भरे अंदाज से दूर हो जाना बड़ा कष्टप्रद था दीपा के लिए। साथ में समाज की बातें और तंज दीपा को रूआंसा करने लगते। लेकिन बेटी पूजा के बहाने जीना अब उसकी मजबूती और मजबूरी दोनों थी। बुरे दिनों का दौर खत्म होने के बजाय और भी डरावना होता जा रहा था। दोनों मां बेटी अब एक दूसरे के लिए जीने का बहाना बने हुए थे।

  पूजा अब कालेज की पढ़ाई करने लगी। मिलनसार प्रवृत्ति की पूजा खेल और अन्य गतिविधियों में भी अच्छी थी। घर के माहौल से बाहर निकलकर उसे कॉलेज में दूसरी जिंदगी जीनी पड़ रही थी। अब अपने अतीत को वह ख्यालों में भी जगह नहीं देना चाहती थी। कई नए ख्याल उसके जहन में जगह बना रहे थे। 
  शहरी दोस्तों के बीच ब्वॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड वाला फैशन देखकर पूजा भी एक नई शुरुआत की ओर प्रेरित हुई और सफर के लिए निकल पड़ी। कालेज की पढाई के दौरान वह प्रेम की गिरफ्त में आने लगी। इजहार इकरार और बेशुमार वाला मौसम निकल पड़ा। इश्क में शहर हो रही पूजा बायफ्रैंड अमित के साथ घुमती और दोस्तों संग मस्ती में व्यस्त होकर अपने अतीत को भूलने की कोशिश करने लगी। अपनी नीरस जिन्दगी के पलों को पीछे छोड़ वह एक नई शुरूआत की ओर बढ़ने लगी। प्रेम में गिरफ्त पूजा अमित के साथ समय बिताती, बातें करती और अपने गम साझा करती। समय बिताने के इसी क्रम में एक दिन बारिश के सुहाने मौसम में पूजा और अमित बाइक पर घुमने निकल पड़े। जैसा आमतौर पर प्रेमी जोड़े प्रेमासक्त होकर करते हैं। शहर से दूर एक विराने में बाइक किनारे कर ये दोनों जंगल की ओर टहलने निकल पड़े। ............

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   अगले दिन सुबह श्यामपुर की गलियों में एक चर्चा आग की तरह फैलीे और चर्चा जोरों पर थी। अखबार की एक खबर सुर्खियों में थी।
    देहरादून में कालेज की एक छात्रा की नाले में बहने से मौत। लाश संदिग्ध अवस्था में बरामद। छात्रा की लाश से कुछ दूरी पर एक युवक की लाश भी पाई गई। बताया जा रहा है कि पूजा (19 वर्ष) पुत्री रघुवर सिंह व दीपा देवी और युवक अमित (24 वर्ष) पुत्र रामप्रसाद और जानकी देवी देहरादून से घुमने के लिये बेरास गांव की तरफ आये थे। ग्रामीणों ने बताया कि बाइक खड़ी कर दोनों जंगल की ओर चल पड़े। भारी बारिश के चलते अचानक उफान भरता नाला आ गया और ये दोनों उफनते नाले की चपेट में आ गये जिससे दोनों की मौत हो गई। देर रात दोनों की खोजबीन के लिए ग्रामीणों की सहायता से सर्च अभियान चलाया गया। शव मिलने के बाद पंचनामा भरकर दोनों के शव परिजनों के सुपूर्द कर दिये गये हैं।

  देश दुनिया की तमाम खबरों की तरह यह भी रोज की एक सामान्य घटना थी। लेकिन श्यामपुर के लिये यह घटना खास रूचि वाली थी क्योंकि रघु का परिवार जीवन का बड़ा हिस्सा यहां बिताकर गया था। लेकिन अचम्भित करने वाली बात ये कि इस सम्पूर्ण घटना की चर्चा का केन्द्र थी लड़की की मां यानि दीपा

                                          "ओमांश"


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