अबला



नहीं बेबस और लाचारी मैं
समाज की हिस्सेदारी में
हां झेलें जाने कितने फरोस
यहां जिस्म से कईं टुकड़ों में
कोई लोमड सा चिपटा मुझमें 
छटपटा के भी मैं हार गई
झेले जाने कितने कतल
इन हादसों के ही इम्तहान में
मैं ममता भी थी, बेटी भी
हां दुलार भी थी किसी भाई की,
ठगी गईं थी सब रूपों में 
तन लडकी का लेकर मैं
फौंज सिरफिरे ले आ जाते
अरमानों का गला घोंटने,
सम्भलती जब-जब आंसू छिपाकर
अपने जख्म-ओ-मसले में
हां तपी हूं कितनी लपटों में
बस बची रही मैं जलने को
छला कभी ससुराल ने मुझको
कभी डसा बेगानों नें
कभी डायन बता कर पीटा मुझको
कभी कोख में ही दुत्कारी मैं
नये बहाने लेकर जीती 
मरती रही बेचारी मैं
रख लेती थी चीख दबाकर
सांसों में खूंखार सी रातों में
बस बहुत हुआ अब नहीं सहूंगी
अबला ना समझ हूं दुर्गा मैं...
                         
                                       उमेश नैलवाल

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