परिस्थिति


ये जो ले आती है
अनन्तता की ओर
उपजाती है नये किस्से, 
कुछ हादसे, कुछ नीरसता, 
कुछ मोड़,
नये रास्तों की ओर
कुछ नये अंदेशे पैदा कर 
वेदना की आहट होती है
लेकिन रूह को आभास नहीं,
फिर सहसा होती है.......
धक्क.....!
और ले आती है लम्बा.....विराम
जो इस सितम की ओर ले जाती है
यह है परिस्थिति।

अब शुरू होती है किस्सागोई
उभर-उभर कर कौंधती,
दोहराई जाती तकदीर और
अभागेपन की उक्ति,
दोष पिरोया जाता,
गढ़ा जाता पिछला जन्म
संवरने को इस परिस्थिति से 
बची होती एकमात्र यही युक्ति.....
              उमेश नैलवाल

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