काबिलियत
कुछ तो करूं अपनी काबिलियत के अनुरूप
ये बात रूह को रफ्तार दे जाती है,
लेकिन हूं किस काबिल आखिर
ये बात समझने में कई रात बेकार हो जाती हैं।
ना पंहुच पाता किसी अंजाम की ओर
यूं ही मेरी अकल बढ़ती जाती है,
थोडा जोश पाकर कुछ नया करता हूं कभी
और फिर अपनी ही नजर लग जाती है।
सफलता फिर नहीं दिखती आस-पास फटकती
और अब तकदीर मेरी गुनहगार हो जाती है,
वक्त और किस्मत के साथ चलती इस तकरार में
हर बार मेरी ही हार हो जाती है।
औकात से ऊपर वजूद हो मेरा
ये चाहत मेरी नींद उड़ा ले जाती है,
और कुछ हासिल करने की इस कसमकश में
मेरी बेचैनी को खुराक मिल जाती है।
कुछ तो करूं अपनी काबिलियत के अनुरूप
ये बात रूह को रफ्तार दे जाती है....
उमेश नैलवाल

Ye poem mujpe be bilkul Sahi baithte h samjh me nahi aata ki kis kabil Hu me 🤔🤔🤔🤔🤔
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