परिस्थिति
जब जब खिलाफ़ थी परिस्थितियां,
उम्मीदों ने सहारा दिया है।
ज़िन्दगी बिखरने को तैयार थी,
ख्वाहिशों ने बसेरा दिया है।
माथे पर शिकन की लकीरें बनी,
वक्त ने मोहलत का दिलासा दिया है।
दिन पल-पल हिसाब मांगता रहा,
लेकिन सदियों ने लम्हों को कायदा दिया हैं।
रातें महंगी पड़ी जब-तब,
सवेरा तकदीर ने मुस्कुराता दिया है।
इन मुख्तलिफ़ जकड़नों के बीच,
ज़िन्दगी ने अस्तित्व को नया अंकुर दिया है।
'जो होता, अच्छे के लिए'
इस तालीम ने हर परिस्थिति को एतबार दिया है।
उमेश नैलवाल
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