इनायत

इनायत थी,
तुम दाखिल हुए मेरी ज़िन्दगी में।
गर्दिश,
कि तुम हाथों की लकीर ना बन सके।।
जितना बन पड़ा,
कुर्बां किया तुम्हारी बंदगी में।
मोहब्बत की दास्तां में,
हम और अमीर ना बन सके।।
सब कुछ गिरवी रखा,
तुमसे वफ़ा की संजीदगी में।
एक ज़मीर था बचा,
उसे बेच हम फ़कीर ना बन सके।।
कुर्बतों का दौर रहा,
जब रहमतों की अदायगी में ।
तुमसे बचाकर रिश्ता ' ओमी '
हम तकदीर ना बन सके।।
                 उमेश नैलवाल

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