समीक्षा के बहाने...

लॉकडाउन के इन दिनों समय काटने के लिए चयनित फिल्में देख रहा हूं। हालांकि यह समीक्षा न होकर बस प्रतिक्रिया भर है।
बात ये है कि कल बेवफाई पर आधारित बॉलीवुड फिल्म 'ये साली आशिक़ी' देखी और आज प्रेमाधारित एक खूबसूरत मलयालम फिल्म '96' देख ली। दोनों बिल्कुल विपरीत, लेकिन दोनों अलग नजरिए से अच्छी फिल्म कही जा सकती हैं।
कुछ कहानियां आपके जीवन से खुद ब खुद जुड़ने लगती हैं या कहें बहुत सी कहानियां लगभग एक सी होती हैं। आप उन कहानियों को देखते सुनते हुए अपना वो वक्त जीने, दोहराने लगते हैं।
 'ये साली आशिक़ी' जहां प्रेम में मुझे अब तक घायल न होने पर शाबासी सी देती है, वहीं  फिल्म '96' देख कर खुद पर तरस आता है कि मैं आज तक ऐसा प्रेम क्यों नहीं जी पाया!
जब किशोरवस्था में था, तो प्रेम कहानियों को जीने और सुनने के लिए बहुत उतावला रहता था। जेहन ओ दिमाग में बिल्कुल ऐसी ही कई कहानी, कई किरदारों के साथ जीता आया। लेकिन असल में कभी ऐसा संपूर्ण प्रेम जीने या शुरू करने का मौका नहीं मिला।
एक दोस्त से प्यार हुआ लेकिन एकतरफा ही रहा। दोस्ती टूट न जाए इसलिए कभी सामने कहने की हिम्मत नहीं हुई, और एक दिन वॉट्सएप मैसेज में जैसे तैसे बताया की तुम प्यार हो, लेकिन उससे पहले ये डायलॉग मार दिया कि तुम्हारी दोस्ती इस प्यार से अनमोल है, बस दोस्ती मत तोड़ना। 
तो फिलहाल दोस्ती बरकरार है और जवाब का इंतजार आज भी है, जिसकी कबूल होने की संभावना शायद इस जन्म में मुमकिन नहीं।
दो एक प्रेम सम्बन्ध और रहे, पर इतने मजबूत नहीं थे कि कोई जीवन परिवर्तित या समर्पण कर देने की कुव्वत रखते हों। 
हालांकि 'ये साली आशिक़ी' जैसा थोड़ा मसला एक माशूका ने मेरे साथ भी किया पर फिल्मी सीन जैसा हो जाने की नोबत मैंने नहीं आने दी। बस किनारा कर लिया। आज भी वो प्रेमिका मुझे मैसेज से याद कर लेती है और अपनी गलती स्वीकारते हुए माफ़ी मांगती है। मैं उसके झांसे में अब नहीं आता और उसके लिए उपजे भावों पर आसानी से काबू पा लेता हूं।
प्रेम का एहसास किसी की बेवफ़ाई पर नफ़रत करने से ज्यादा खूबसूरत है। इसमें आत्मा पाक हो जाती है। प्रेम में गुदगुदी होती है, बेवजह की मुस्कुराहट होती है। प्रेम को '96' फिल्म वाले अंदाज़ में जीने और किसी के लिए बहुत कुछ कर जाने की तमन्ना आज भी हिलोरे मारती है। बहुत खूबसूरत फिल्म है।
                                             ओमांश

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