कहानी : नियति
......…..................जब बेटियों से ही वंश की नींव है तो बेटियां अभिशाप कैसे है?.........
लड़का आपके बुढापे का सहारा बनेगा और लड़की पराये घर की बहु ! आप ये मान्यता बदल कर देखिये और यकिन मानिये, जो ममत्व वृद्धावस्था में आपकी बेटी में आपके प्रति होगा, उसकी रत्ति भर संवेदना भी आपको बेटे में नजर नहीं आयेगी। जो संभावनाएं आपको बेटे में नजर आती हैं, उन्हें एक बार बेटी में तलाश के देखिए.....
मानवीय सभ्यता के उत्थान से ही मातृ सत्ता मानवीय समाज के विकास में प्रारंभिक भूमिका निभाती आयी है, क्योंकि स्त्री ही सृष्टि का आरंभ और पतन है। सभ्यताओं में स्त्री ही नेतृत्व कर्ता रही है लेकिन उस शक्ति को कुशलता के साथ क्षीण कर पितृसत्तात्मक समाज में तब्दील कर दिया गया। इसके लिए बहुत से मिथक और सिद्धांत रचे गए। अब उस नारी को किसी की पत्नी और बेटी के रूप में ही जाने जाने की अपेक्षा की जाती है। उसे स्वतंत्र अस्तित्व और मुखिया स्वीकारने की हिम्मत हमारे समाज में नहीं बची है........... धन्यवाद।
इन शब्दों के साथ 'कन्या भ्रूण हत्या' विषय पर हो रहे कार्यक्रम में जैसे ही नियति ने भाषण खत्म किया दिल्ली यूनिवर्सिटी का सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
नियति, मनहूसियत के साथ धोखे से उपजी थी वो।
अंजू और ललित की तीसरी सन्तान।
धोखे से कैसे ?.....
इसकी कहानी भी बड़ी दर्दनाक है। अंजू और ललित की पहली सन्तान के रूप में जन्मी एक लड़की। नाम रखा गया सीमा।
पहली उपज थी, तो खुशी ही पनपी थी। जश्न मनाया गया। लक्ष्मी जो आई थी। सीमा के हिस्से की सारी खुशियां उस पर लुटाई गई। ललित का परिवार भारतीय परम्परा के अनुरूप रूढिवादिता में जीता आ रहा था। लक्ष्मी को एक बार ही बर्दाश्त करने की सोच रखता था। हालांकि ललित शहर में अच्छी नौकरी पर था और घर-परिवार को संभालने में सक्षम था।
दूसरी बार जब अंजू की कोख भरी, स्वाभाविक रूप से इस बार लक्ष्मी की जगह कन्हैया की चाहत सभी के जहन में उफान भरने लगी। लेकिन ईश्वर की कृपा इस बार भी लक्ष्मी बनकर बरसी। रूढिवादिता और पुराने खयालातों का समाज, जिसका नेतृत्व फिलहाल अंजू की सास कर रही थी, निरासावादी लहजा अख्तियार करने लगी। इस बच्ची का नाम रखा गया रिद्धि। रिद्धि के हिस्से खुशियों की सौगात थोड़ा कम ही आई। जैसा कि परम्परा के हिसाब से पहली सन्तान के बाद के बच्चों की महत्ता थोड़ा कम हो ही जाती है, क्योंकि मां-बाप सहित तमाम समाजवासियों का उत्साह अब तक ठंडा पड़ चुका होता है। अब तक सभी सोचने लगते हैं कि बच्चा पैदा करना कोई बड़ा काम नहीं रह गया है, ये तो बच्चों वाला काम है। उस पर भी अगर लक्ष्मियां लाइन लगाकर अवतरित होने लगें। दोनों बच्चियां साक्षात लक्ष्मी ही थी। दोनों पास-पडोस वालों का खिलौना हो गई थी। आपस में ही व्यस्त रहती। कभी खेलते, कभी रोते- झगड़ते, एक-दुसरे को पुचकारते। अंजू और ललित के लिये भी दोनों हंसी-खुशी का ही पात्र थीं।
तीसरी बार जब अंजू पेट से हुई, सास-ससुर सहित तमाम माहौल बनाने वाले सदस्यों को लडके के सिवा कोई विकल्प स्वीकार न था। परिणामस्वरूप शहरों में सुविधाओं के चलते कई भ्रूण जांचों और जड़-पूछ के फलस्वरूप भ्रूण को कोख में ही समाप्त कर देने के निष्कर्ष पर पंहुचा गया। जिसका कारण भ्रूण में एक और लक्ष्मी की उपस्थिति को समझा गया था। जो इस बार इस परिवार को मंजूर न थी। इसी तरह कुछ सालों के दरमियान एक के बाद एक तीन भ्रूणों को कोख में ही लड़की समझकर मौत दे दी गई। अब तक अंजू की हालत भ्रूण विकसित करने की फौकट मशीन सी हो गई थी। लेकिन एक मां के लिए विकट होती है यह परिस्थिति, कोख में बच्चे को महीनों पाल कर दर्द में जीना और फिर न चाहते हुए भी अंत में मौत दे देना। इसी अवसाद में वह ममता का गला घोंटकर कई पापों की भागीदार हो गई। वंश बढ़ाने को अब युवराज की ही जरूरत थी। क्योंकि बेटियों द्वारा वंश की मेजबानी इतिहास के खिलाफ थी। और यहां इतिहास को नये सिरे से पिरोने को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं थी।
इतने भ्रूणों के सर्वनाश के बाद अगली दफे अंजू गर्भवती हुई तो इस बार कई बाबाओं और पण्ड़ों के दरबार में जाकर भविष्यवाणियां करायी गई। कई पंच-प्रपंचनों के बाद लड़के होने की उम्मीद जगी और युवराज का इन्तजार अदद से किया जाने लगा।
लेकिन अब की बार सभी ढकोसले झूठे साबित हुए। सारी भविष्यवाणियां धरी रह गई। कुदरत का धोखा यह कि इस बार भी फूल सी एक कन्या ही जन्मीं। अब की बार अंजू की सृजनशीलता को दुत्कारा गया। सास ने कई तरह के ताने सुनाकर अंजू का जीना बेहाल कर दिया। ऐसी सन्तानों से बांझ होना बेहतर की परिभाषा को तवज्जो दिया जाने लगा। नवजात को मनहूसियत का ब्रांड अम्बेसडर घोषित कर दिया गया। लेकिन मां की ममता के आगे मनहूसियत दादी की जबान से आगे न बढ़ सकी।
अंजू ने बच्ची का नाम रखा नियति, यानि भाग्य। ये धोखा अंजू का भाग्य थी। कोमल सी ये गुड़िया बड़ी रचनाशील थी। हमेशा मुस्कुराती और सभी के आलिंगन में खुशी-खुशी समा जाती। उसके लिये कोई अन्जान न था। दोनों बडी बहनों की तरह ये भी कुशाग्र बुद्धि की थी।
मां-बाप सहित तमाम चिन्तनीय लोगों के लिये यह वाकई नियति साबित हुई, जब चौथी सन्तान के रूप में एक लड़के ने जन्म लिया। खुशियां अपने चरम पर पहुंच गई। अन्जू जैसे भव सागर तर गई थी। उसके तमाम संघर्ष जैसे बेटे के पैदा होने के साथ ही खत्म हो गये थे। सभी चिन्तायें, सास के ताने और सामाजिक गप्पों का डरावना दौर समाप्त हो गया था। युवराज का नाम पड़ा अभय।
अब सब कुछ सही हो गया था। अंजू का जीवन अब पटरी पर लौट चुका था और सास का वंश प्रशस्ति का चिंतन भी खत्म हो चुका था। सभी की मुरादें अब अभय के रूप में पूरी हो चुकी थी।
बच्चे हंसी-खुशी पलने-बढ़ने लगे। हर साल गर्मियों की छुटिटयों में सभी दादी से मिलने शहर से गांव आते। लेकिन दादी का मन अपने राजकुमार पर ही रमता। लड़कियों को देखकर वो नाक ही उचकाती। नियति को वो अब तक मनहूस ही मानती और उसे हर बात में टोकती ही रहती। लड़कियों के दिल में भी दादी के लिये कोई सम्मान व अपनत्व शेष न था। जो कुछ बचा था वो बुढ़ापे की बददुआओं का खौफ था। इसी के परिणामस्वरूप साल में एक बार गांव आना भी ऐसी ही पारम्परिक मजबूरी का हिस्सा थी। बच्चें बड़े हो रहे थे और अपनी राह सुनिश्चित कर लक्ष्य की ओर पग बढ़ा रहे थे।
सीमा स्नातक करने के बाद महिला सब इंस्पेक्टर की परीक्षा पास कर गई। रिद्धि बीटेक करने के बाद अच्छे प्लेसमेंट के साथ इंजीनियर बन गई और कुछ वक्त में एक बड़ी कम्पनी से जुड़कर कैलीफोर्निया चली गई। नियति पढाई के साथ-साथ अन्य कलात्मक गतिविधियों में भी अग्रणी थी। स्कूल, कालेज में वह खुद को एक अच्छी वक्ता और नृतिका के रूप में स्थापित कर चुकी थी। इसके साथ ही वो कालेज की सामाजिक गतिविधियों में भी प्रमुखता से प्रतिभाग करती। सामाजिक सरोकारों से जुड़े नुक्कड़-नाटकों के माध्यम से वह सामाजिक जागृति में योगदान देने लगी। कन्या भ्रूण हत्या को लेकर उसने कई मंचों पर भावविभोर और शर्मशार कर देने वाले भाषण और नाटक प्रस्तुत किये।
ओमांश
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