हम भारत के लोग...
हमने जनता को भीड़ बनाया
हमने जनतंत्र की हत्या कर दी
हमने खुद पर सवाल दागे फिर
हमने अपनी जुबां काट दी।
कलम ने लिखनी चाही क्रांति, तो
अपने ही खून से हमने
अपने हकूकों के खिलाफ
अपनी मौत लिख दी।
हमने गुट बनाए
सत्तासीनों के इशारों पर
हमने नफरत का जहर पाया
जाति धर्म की अकड़ पर
जहां जैसी जरूरत पड़ी उनको
भरपूर मौजूं बने हम।
हम विश्व गुरु के प्रतियोगी थे
उस पैमाने से सब चंगा था
इतिहास की सारी लड़ाई में
विनाश का परिणाम यही दंगा था।
हमको भेड़ बनाकर हांका
हम काटने दौड़ पड़े खुद को
हम पहुंचे अपनी बर्बादी तक
लोकतंत्र में अपना हक नहीं मांगा।
हमने नहीं चाही रोटी
न जाना शिक्षा, रोजगार का हाल,
विकास के झोल में उलझे
ना ही पूछे कभी बुनियादी सवाल।
हमने किताबें छीनी बच्चों से
पत्थर थमा दिए मासूम हाथों में
हमारे नीति निर्धारकों ने हमें
भारत का लोक बनाने की ठानी और
सत्तासीनों ने हर दौर में उकसाकर, हमें
जात धर्म पूछती हत्यारी भीड़ बना डाला।
हम जलाकर अपनी झोपड़ी
जहर के नशे में सब ख़ाक करते रहे
हम सुलगाते दंगा और
राख होने के बाद अमन करते रहे।
हम भारत के लोग
भारत को एक हिंसक, असामाजिक और अलोकतांत्रिक देश बना रहे हैं
जबकि हम प्रतिबद्ध हैं भारत को
समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक
गणराज्य बनाने के लिए।।
ओमांश
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